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संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 के अंतर्गत पट्टे से संबंधित क्या प्रावधान हैं? (What are the provisions related to a lease under the Transfer of Property Act, 1882?)

पट्टा संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 105-117 के अंतर्गत परिभाषित है। यह भूमि या संपत्ति के उपयोग का अधिकार एक निश्चित अवधि और प्रतिफल के अधीन देता है। इसमें पक्षकार, अवधि, विषय वस्तु, और अधिकारों व दायित्वों का निर्धारण किया गया है।

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परिचय

पट्टा एक कानूनी दस्तावेज है, जो भूमि या संपत्ति के उपयोग के अधिकार को निर्धारित करता है। यह एक प्रकार का अनुबंध है, जिसमें एक पक्ष (पट्टेदार) दूसरे पक्ष (पट्टेदार) को संपत्ति का उपयोग करने की अनुमति देता है, आमतौर पर एक निश्चित अवधि के लिए और कुछ शर्तों के अधीन। पट्टे का उपयोग विभिन्न प्रकार की संपत्तियों, जैसे कि कृषि भूमि, आवासीय संपत्तियाँ, और वाणिज्यिक संपत्तियों के लिए किया जा सकता है।

पट्टे की परिभाषा

धारा 105 स्थावर सम्पत्ति का पट्टा ऐसी सम्पत्ति का उपभोग करने के अधिकार का ऐसा अन्तरण है जो एक अभिव्यक्त या विवक्षित समय के लिये या शाश्वत काल के लिये, किसी कीमत के, जो दी गई हो या जिसे देने का वचन दिया गया हो, अथवा धन या फसलों के अंश या सेवा या किसी अन्य मूल्यवान वस्तु के, जो कालावधीय रूप से या विनिर्दिष्ट अवसरों पर अन्तरिती द्वारा, जो उस अन्तरण को ऐसे निबन्धनों पर प्रतिगृहीत करता है, अन्तरक को की या दी जानी है, प्रतिफल के रूप में किया गया हैं। पट्टे से संबंधित प्रावधान संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 105 से 117 के अंतर्गत उल्लिखित हैं[1]।

पट्टे का करार (Agreement to lease)

ध्यान रहे पट्टा, पट्टे के करार से भिन्न है। पट्टा करार द्वारा व्यक्तिगत अधिकार का सृजन होता है, अचत सम्पत्ति में किसी हित का अन्तरण, चाहे वर्तमान में या भविष्य में नहीं होता। पट्टेदार को कोई कब्जा भी नहीं प्राप्त होता। अतः पट्टे के करार को पट्टा नहीं माना जा सकता है। पट्टे को सम्पत्ति में एक हित माना जाता है।

पट्टा के आवश्यक तत्व (Essentials of a lease)

पट्टा के निम्न आवश्यक तत्व माने जाते हैं:

1. पक्षकार (The parties)

पट्टे के दो पक्षकार होते हैं:

पट्टाकर्ता और पट्टेदार (lessor and lessee)- पट्टाकर्ता को भूस्वामी (landlord) कहते हैं।

I. पट्टाकर्ता (Lessor)

वह व्यक्ति जो अचल सम्पत्ति में हित का अन्तरण करता है, पट्टाकर्ता कहलाता है। जब हम सम्पत्ति में हित के अन्तरणकर्ता की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो अचल सम्पत्ति के उपभोग के अधिकार का अन्तरण करता है और वहीं पट्टाकर्ता कहलाता है। वह व्यक्ति जो सम्पत्ति का पूर्ण स्वामी है और जिसमें कोई असमर्थता या विधिक निर्योग्यता (incapacity or legal disability) नहीं है किसी भी अवधि के लिए पट्टा दे सकता है। परिणामतः एक अवयस्क पट्टाकर्ता नहीं हो सकता है। इस धारा के प्रावधानों के अन्तर्गत एक पट्टेदार (lessee) भी पट्टा प्रदान कर सकता है और वह पट्टा, सामान्यतया उप पट्टा (sub-lease) कहलाता है, परन्तु इस धारा के प्रावधानों के अन्तर्गत वह भी पट्टा होगा।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने जी० श्री धरामूर्ति बनाम हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लि० नामक वाद[2] में अभिनिर्धारित किया कि केन्द्रीय सरकार के द्वारा इस्सो की सम्पत्ति को इस्सो स्टैण्डिंग रिफाइनिंग कम्पनी ऑफ इण्डिया लि० को और तत्पश्चात् हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन को अन्तरित किये जाने के कार्य को इस धारा के अन्तर्गत उप पट्टे पर दिया जाना नहीं माना जा सकता।

II. पट्टेदार (Lessee)

वह व्यक्ति जिसे सम्पत्ति में के उपभोग के अधिकार को अन्तरित किया जाता है, अर्थात् अन्तरिती, उसे पट्टेदार कहते हैं। पट्टा किसी भी व्यक्ति को जो पट्टे के निष्पादन की तिथि को संविदा करने हेतु सक्षम है, प्रदान किया जा सकता है। पट्टा कई व्यक्तियों को प्रदान किया जा सकता है उसे संयुक्त अभिधारी (joint tenants) के रूप में या सामान्यिक अभिधारी (tenants in common) के रूप में ले सकते हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने चिरंजीलाल बनाम भगवान दास नामक वाद[3] में यह अभिनिर्धारित किया कि उस भूमि पर बनाये गये भवनों का विभाजन सौमा परिसीमा (metes and bounds) पक्षकारों के अपने हिस्से के अनुसार बिना पट्टाकर्ता की अनुमति के हो सकता है। एक फर्म (भागीदारी) पट्टेदार हो सकती है।

2. विषय वस्तु (The subject matter)

पट्टे की विषय वस्तु अचल सम्पत्ति होगी। अचल सम्पत्ति की परिभाषा अधिनियम की धारा 3 में दी गई है। कृपया उसे देखें। परिभाषा के अनुसार अचल सम्पत्ति न केवल भूमि, भवन और खान खदानों के डी. रूप में हो सकती है, अपितु, भूमि से उत्पन्न होने वाले लाभों के रूप में जैसे-मछली का अधिकार (fisheries) और पार घाट या नौघाट (ferry) का अधिकार के रूप में भी हो सकती है। अतः ये भी पट्टे की विषय वस्तु हो सकते हैं।

यह प्रश्न कि क्या केवल 'भवन' का पट्टा अनुज्ञेय है या पट्टे में भवन के नीचे की जमीन भी सम्मिलित है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुये हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने किशन चन्द बनाम बिहारी लाल[4] में अभिनिर्धारित किया कि विधि यह प्रावधान नहीं करती कि भूमि के ऊपर भवन का पट्टा अनुज्ञेय है या इससे (भवन के पट्टे में) नीचे की भूमि सम्मिलित होना अनिवार्य है। मात्र भवन का पट्टा सम्भव है।

3. पट्टान्तरण या आंशिक अन्तरण (Demise or partial transfer)

सम्पत्ति में उपभोग के अधिकार का अन्तरण होना चाहिये। अतः शब्द 'उपभोग' के अन्तर्गत कब्जा भी सम्मिलित है। पट्टे की मूलभूत अवधारणा भी यही है कि यह स्वामित्व के अधिकार में से कब्जे के अधिकार का पृथक्करण है[5]। सामण्ड के अनुसार यह स्वामित्व और कब्जे के पृथक्करण का परिणाम है। यदि स्वामित्व का अन्तरण, सशर्त या बिना शर्त होता है, वह पट्टा नहीं होगा।" ऐसी सम्पत्ति के उपभोग करने के अधिकार का अन्तरण' का तात्पर्य है या इस बात का परिचायक है कि स्वामित्व के सभी अधिकार नहीं अन्तरित हो जाते करार के माध्यम से यह व्यवस्था नहीं की जा सकती कि पट्टेदार के पास कब्जा नहीं रहेगा यदि ऐसा करार हो जाये तो, वह पट्टा नहीं होगा। अतः मात्र उपभोग के अधिकार का अन्तरण, बिना कब्जे के अधिकार के अन्तरण के पट्टा नहीं होगा

4. अवधि या समय (The term or period)

पट्टे का एक अन्य आवश्यक तत्व है, पट्टे की अवधि, अर्थात् सम्पत्ति में उपभोग के अधिकार को निश्चित समय अभिव्यक्त या विवक्षित या शाश्वत काल के लिये होना चाहिये।

धारा 105 में प्रयुक्त शब्द 'निश्चित' का यह तात्पर्य नहीं है कि वह पट्टे की तिथि पर निश्चित होना चाहिये। यह पर्याप्त है कि यह एक भावी तिथि को निश्चित किये जाने की समर्थता रखता है या एक भावी तिथि को भी निश्चित किया जा सकता है[6]। जहां तक पट्टे की अवधि का प्रश्न है, यदि पट्टा इस प्रश्न पर चुप है तो यह पट्टा नहीं है। पट्टेदार के जीवन काल के लिये पट्टा विधि सम्मत है। एक दिन के लिये भी पट्टा वैध या विधि-सम्मत पट्टा है पट्टे की अवधि विधि या चलन के द्वारा विवक्षित हो सकती है।

अवधि की दृष्टि से यह धारा तीन प्रकार के पट्टों को मान्यता देती है:

  • निश्चित अवधि के लिये पट्टा,
  • आवधिक या कालिक (periodic) पट्टे; और
  • शाश्वत काल के लिये पट्टे (leases in perpetuity)

5. प्रतिफल (Consideration)

पट्टे के आवश्यक तत्वों में से एक है प्रतिफल। अर्थात् पट्टाकर्ता द्वारा अचल सम्पत्ति में के उपयोग का. अधिकार प्रतिफल के एवज में किया जाना चाहिये या पट्टा प्रतिफल के एवज में किया जाना चाहिये। यह प्रतिफल प्रीमियम के रूप में हो सकता है या भाटक के रूप में। प्रीमियम को कीमत भी कहते हैं जो दो गई हो या जिसे दिये जाने का वचन दिया गया हो। वास्तव में यह क्रय मूल्य है जो अभिधारी उस लाभ के बदले में भुगतान करता है जो वह एक पट्टे के अन्तर्गत प्राप्त करता है. यह कीमत नकद धन के रूप में हो सकती है और देय ऋण के रूप में भी हो सकती है। पर हर हालत में यह कीमत पट्टे के लिये दी गई है या जिसके देने का वचन दिया गया है, सम्पत्ति के उपभोग के अधिकार के एवज में। ऋण के रूप में देय धन ऐसा होना चाहिये जिसे अभिनिर्धारित किया जा सके या जो अभिनिश्चित होना चाहिये[7]।

पट्टाकर्ता और पट्टेदार के अधिकार और दायित्व

तत्प्रतिकूल संविदा या स्थानीय प्रथा न हो तो स्थावर सम्पत्ति का पट्टाकर्ता और पट्टेदार एक-दूसरे के विरुद्ध क्रमशः वे अधिकार रखतें हैं और उन दायित्वों के अध्यधीन होते हैं जो निम्नलिखित नियमों में या उनमें से ऐसों में जो उस पट्टाकृत सम्पत्ति को लागू हों, वर्णित हैं:

1. पट्टाकर्ता के अधिकार और दायित्व

  • सम्पत्ति के आशथित उपभोग के बारे में सम्पत्ति को किसी तात्विक त्रुटि को, जिसको पट्टाकर्ता जानता है और पट्टेदार नहीं जानता और मामूली सावधानी बरत कर भी मालूम नहीं कर सकता, पट्टेदार को प्रकट करने के लिए पट्टाकर्ता आबद्ध है;
  • पट्टाकर्ता पट्टेदार की प्रार्थना पर उसे सम्पत्ति पर कब्जा देने के लिये आबद्ध है;
  • यह समझा जायेगा कि पट्टेदार से पट्टाकर्ता संविदा करता है कि यदि पट्टेदार पट्टे में आरक्षित भाटक देता रहे और पट्टेदार या आबद्धकर संविदाओं का पालन करता रहे, तो उस पट्टे द्वारा परिसीमित समय के दौरान वह सम्पत्ति को निर्विघ्न धारण कर सकेगा।
  • ऐसी संविदा का फायदा पट्टेदार के उस हित से उपाबद्ध होगा और उसी के साथ जायेगा जो उसका पट्टेदार के नाते हो और ऐसे हर व्यक्ति द्वारा प्रवर्तित कराया जा सकेगा जिसमें वह पूर्ण हित या उसका कोई भाग समय-समय पर निहित हो।

2. पट्टेदार के अधिकार और दायित्व

  • यदि पट्टे के चालू रहने के दौरान सम्पत्ति में कोई अनुवृद्धि होती है तो ऐसी अनुवृद्धि (जलोढ़ सम्बन्धी तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन) पट्टे में समाविष्ट समझी जायेगी
  • यदि अग्नि, तूफान या बाढ़ से अथवा किसी सेना या भीड़ द्वारा की गई हिंसा से अथवा अन्य अप्रतिरोध्य बल से सम्पत्ति का कोई तात्विक भाग पूर्णतः नष्ट हो जाये या. उन प्रयोजनों के लिये, जिसके लिये वह पट्टे पर दी गई थी, सारवान रूप में और स्थायी तौर पर अयोग्य हो जाए तो पट्टा, पट्टेदार के विकल्प पर, शून्य होगा;परन्तु यदि क्षति पट्टेदार के सदोष कार्य या व्यतिक्रम के कारण हो तो वह इस उपबन्ध का लाभ उठाने का हकदार नहीं होगा;
  • यदि पट्टाकर्ता सूचना के पश्चात् युक्तियुक्त समय के अन्दर सम्पत्ति की ऐसी मरम्मत करना उपेक्षित करे, जिसे करने के लिये वह आबद्ध है, तो पट्टेदार स्वयं उसे करा सकेगा और ऐसी मरम्मत का व्यय भाटक में से ब्याज सहित काट सकेगा या पट्टाकर्ता से अन्यथा वसूल कर सकेगा;
  • यदि पट्टाकर्ता ऐसा संदाय करने में उपेक्षा करे, जिसे करने के लिये वह आबद्ध है और जो यदि उस द्वारा न किया जाये तो पट्टेदार से या उस सम्पत्ति से वसूलीय है तो पट्टेदार ऐसा संदाय स्वयं करेगा और उसे उस भाटक में से ब्याज सहित काट सकेगा या पट्टाकर्ता से अन्यथा वसूल कर सकेगा। 

पट्टे का पर्यवसान

स्थावर सम्पत्ति के पट्टे का पर्यवसान हो जाता है-

1. तद्द्वारा परिसीमित समय के बीत जाने से,

2. जहां कि ऐसा समय किसी घटना के घटित होने की शर्त पर परिसीमित है, वहां ऐसी घटना के घटित होने से,

3. जहां कि उस सम्पत्ति में पट्टाकर्ता के हित का पर्यवसान किसी घटना के घटित होने पर होता है या उसका व्ययन करने की शक्ति का विस्तार किसी घटना के घटित होने तक ही है वहां ऐसी घटना के घटित होने से,

4. उस दशा में, जब कि उस सम्पूर्ण सम्पत्ति में पट्टेदार और पट्टाकर्ता के हित एक ही व्यक्ति में, एक ही समय, एक ही अधिकार अधिकार के नाते निहित हो जाते हैं;

5. अभिव्यक्त अभ्यर्पण द्वारा, अर्थात् उसी दशा में जब कि पट्टेदार पट्टे के अधीन अपना हित पारस्परिक करार द्वारा पट्टाकर्ता के प्रति छोड़ देता है,

6. विवक्षित अभ्यर्पण द्वारा,

7. समपहरण द्वारा अर्थात्

  • उस दशा में जब कि पट्टेदार किसी ऐसी अभिव्यक्त शर्त को भंग करता है, जिससे यह उपबन्धित है कि उसका भंग होने पर पट्टाकर्ता पुनः प्रवेश कर सकेगा, या
  • उस दशा में, जब कि पट्टेदार किसी अन्य व्यक्ति का हक खड़ा करके या यह दावा करके कि वह स्वयं हकदार है, अपनी पट्टेदारी हैसियत का त्याग करता है, या
  • जब कि पट्टेदार दिवालिया न्यायनिर्णीत हो जाता है और पट्टा यह उपबन्ध करता है कि पट्टाकर्ता ऐसी घटना के घटित होने पर पुनः प्रवेश कर सकेगा, और जब कि उन दशाओं में से किसी में पट्टाकर्ता या उसका अन्तरिती पट्टेदार को पर्यवसान करने के अपने आशय की लिखित सूचना देता है,

8. पट्टे का पर्यवसान करने या पट्टे पर दी गई सम्पत्ति को छोड़ देने या छोड़ देने के आशय की एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को सम्यक् रूप से दी गयी सूचना के अवसान पर।

निष्कर्ष

पट्टा असल जिंदगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। हर व्यक्ति ने घर, कार या अन्य किराए पर लेने से संबंधित प्रक्रिया देखी है। इसलिए आम जनता के लिए पट्टा में हर व्यक्ति के अधिकारों के बारे में जानना और पट्टा को नियंत्रित करने वाले प्रावधानों के बारे में जानना महत्वपूर्ण है[8]। इतना होते हुये भी यह अभिनिर्धारित किया गया है कि इन धाराओं के प्रावधान सामान्य अनुप्रयोग (general application) के हैं, सिद्धान्त और प्राधिकार पर आधारित हैं।


[1]. संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 (Last Updated on October 30, 2024).

[2]. ए० आई० आर० 1991 कर्नाटक 249,

[3]. ए० आई० आर० 1991 देलही 325.

[4]. ए० आई० आर० 1999 हि० प्र० 68.

[5]. सामण्ड, ज्यूरिसप्रूडेन्स, नत्रां संस्करण, (1937) पृ० 597.

[6]. जुथिका मलिक बनाभ एम० वाई० वाल, ए० आई० आर० 1995 सु० को० 1142.

[7]. मनोहर एवं चिताले, वही, वाल्यूम 3 पृ० 119.

[8]. संपत्ति अंतरण अधिनियम (डॉक्टर टी पी त्रिपाठी) 2011 संस्करण.   

Akash Srivastava
Written by Akash Srivastava

Akash Shrivastava, enrolled as an advocate in Bar Council of Uttar Pradesh with degree in B.Com and LL.B from the University of Lucknow. Expertise in corporate sector and revenue-related matters.

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